होली का महत्व और पौराणिक कथा

होली भारत के प्रमुख त्योहारों में से एक है एवं इसको सभी लोग बड़े धूम धाम से मानते है। होली के दिन बच्चों और बड़ो सभी में उत्साह देखने को मिलता है खासकर इस दिन लोग एक दूसरे को रंग लगाकर होली की शुभकामनाये देते है। बच्चे रंग बिरंगी पिचकारियां खरीदकर उनसे रंग डालते है। प्रत्येक वर्ष फाल्गुन मास की पूर्णिमा को होली मनाई जाती है। इस दिन सभी लोग अपने गिले शिकवे भूलकर एक दूसरे को रंग लगाते है और आपस में गले मिलकर होली की खुशी मानते है। होली प्राचीन काल से ही भारत का महत्वपूर्ण त्यौहार माना जाता है। होली के दिन लोग ढोल नगाड़े बजाकर नाच गाने एवं मौज मस्ती कर सभी को होली विश करते है, मिठाई गुजिया खिलाकर आपस में ख़ुशी का इजहार करते है।
2020 में होली –
इस वर्ष होलिका दहन 9 मार्च को एवं रंगवाली होली 10 मार्च को मनाई जाएगी।

 

होलिका दहन की पौराणिक कथा – 

हर त्यौहार को मनाने के पीछे पौराणिक कथा अवश्य होती है, ऐसे ही होली को मनाने के पीछे की पौराणिक कथा भी है – एक समय राक्षसों का राजा हिरण्यकश्यप हुआ करता था एवं उसकी एक बहन थी जिसका नाम होलिका था। हिरण्यकश्यप अपने आप को ही भगवान मानता था एवं जो कोई उसको भगवान मानने से मना करता वो उसको कड़ा दंड देता था। हिरण्यकश्यप का एक पुत्र था जिसका नाम प्रहलाद था, वो परम धर्मात्मा एवं भगवान विष्णु का अनन्य भक्त था। लेकिन जैसे ही उसकी यह बात हिरण्यकश्यप को पता चली की उसका पुत्र ही उसे भगवान नहीं मानता अपितु किसी और की पूजा करता है तो उसे बड़ा क्रोध आया। उसने प्रहलाद को हर प्रकार से डरा धमकाकर कोशिश की कि वो विष्णु की पूजा अर्चना करना बंध करदे और उसे ही भगवान के रूप में स्वीकार करे, लेकिन उसकी किसी भी बात का असर प्रहलाद पर असर नहीं हुआ तब हिरण्यकश्यप ने प्रहलाद को मारने का प्रयास किया लेकिन वो प्रहलाद की हत्या करने में भी सफल नहीं हुआ तब उसकी बहन होलिका जिसको अग्नि में न जलने का वरदान प्राप्त था वो हिरण्यकश्यप के पास आयी और कहने लगी की में प्रहलाद को लेकर आग में बैठ जाउंगी जिससे की प्रहलाद की हत्या हो जाएगी और मुझे कुछ नहीं होगा क्यूंकि मुझे अग्नि में न जलने का वरदान प्राप्त है। होलिका के इस प्रस्ताव से हिरण्यकश्यप बढ़ा प्रसन्न हुआ और उसने होलिका को प्रहलाद को लेकर अग्नि में बैठने की अनुमति दे दी। लेकिन हुआ इसके विपरीत प्रहलाद भगवान विष्णु का भक्त था इसलिए उसे अग्नि तनिक भी हानि नहीं पहुंचा पायी और होलिका जिसने अपने वरदान का दुरूपयोग किया था वो जलकर भष्म हो गयी तब से ही होली के दिन होलिका दहन किया जाता है।

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